Thursday, July 20, 2017

यह रहा देश के अब तक के राष्ट्रपतियों का कार्यकाल

रामनाथ कोविंद देश के 14 वें राष्ट्रपति के रूप में 25 जुलाई को कार्यभार ग्रहण करेंगे। राष्ट्र के सर्वोच्च संवैधानिक पद को सुशोभित करने वाले अब तक के 13 राष्ट्रपति का कार्यकाल इस प्रकार रहा है- देश के आजाद होने के बाद पहला राष्ट्रपति होने का गौरव डॉ राजेन्द्र प्रसाद को प्राप्त हुआ। वह 12 वर्ष तक इस पद रहे और एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे, जो दो बार इस पद के लिए चुने गये। उन्होंने सबसे पहले 26 जनवरी 1950 को राष्ट्रपति का कार्यभार संभाला और वह 12 मई 1962 तक इस पद पर रहे। दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ राधाकृष्णन ने 13 मई 1962 को यह पद ग्रहण किया और 12 मई 1967 तक वह इस पद पर रहे। तीसरे राष्ट्रपति जाकिर हुसैन 13 मई 1967 से 3 मई 1969 तक इस पद पर रहे। डा हुसैन का कार्यकाल के दौरान ही निधन हो गया था। इसके बाद तत्कालीन उपराष्ट्रपति वीवी गिरि को कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाया गया। श्री गिरि 3 मई 1969 से 20 जुलाई 1969 तक कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में काम किया और फिर राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने के लिये इस्तीफा दे दिया। गिरि के इस्तीफा देने के बाद उस समय के मुख्य न्यायाधीश हिदायतुल्ला ने नया राष्ट्रपति निर्वाचित होने तक कार्यवाहक राष्ट्रपति का कार्यभार संभाला। श्री गिरि चुनाव जीतने ने बाद 24 अगस्त 1969 से 23 अगस्त 1974 तक राष्ट्रपति रहे। पांचवें राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद बने और उनकी भी कार्यकाल के दौरान ही मृत्यु हो गई, जिसके बाद उपराष्ट्रपति बसप्पा दानप्पा जत्ती 11 फरवरी 1977 से 25 जुलाई 1977 तक कार्यवाहक राष्ट्रपति रहे।  छठे राष्ट्रपति के तौर पर नीलम संजीव रेड्डी 25 जुलाई 1987 से 24 जुलाई 1982 तक इस पद पर रहे। ज्ञानी जैल सिंह ने 25 जुलाई 1982 से 24 जुलाई 1987 तक सातवें राष्ट्रपति के रूप में काम किया। इसके बाद रामास्वामी वेंकटरमन आठवें राष्ट्रपति बने और 25 जुलाई 1987 से 24 जुलाई 1992 तक इस पद पर रहे। नौवें राष्ट्रपति के तौर पर डॉ़ शंकर दयाल शर्मां का कार्यकाल 25 जुलाई 1992 से 24 जुलाई 1997 तक रहा। दसवें राष्ट्रपति केआर नारायण 25 जुलाई 1997 से 24 जुलाई 2002 तक रायसीना हिल्स में रहे। ग्यारहवें राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का कार्यकाल 25 जुलाई 2002 से 24 जुलाई 2007 तक रहा। इसके बाद प्रतिभा पाटिल 12 वीं राष्ट्रपति बनीं और वह 25 जुलाई 2007 से 24 जुलाई 2012 तक इस पद पर रहीं। वह देश की पहली महिला राष्ट्रपति थीं। वर्तमान राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी वित्त मंत्री और रक्षा मंत्री के पद पर रहने के बाद 25 जुलाई 2017 को देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद संभाला। तेरहवें राष्ट्रपति के रूप में उनका कार्यकाल 24 जुलाई 2017 को समाप्त हो रहा है।

Saturday, July 8, 2017

उत्तराखंड की यादगार यात्रा और मूड ऑफ का पुराना कनेक्शन



सीताबनी में भोजन के बाद एक ग्रूप फोटो


बारी लेडीज की : आदरणीय माताजी (पत्नी की दीदी की सास) के साथ जवां मंडली
 केवल तिवारी
ठंड लगे तो हंस जाओ : सीताबनी के ठंडे झरनों पर स्नान


आओ नदी में उतरें : रामनगर गर्जिया देवी के पास नदी में उतरीं साहसिक महिलाएं
ये हैं भास्कर जोशी : स्वभाव में शांत, गाड़ी चलाने और खर्च करने में उस्ताद
मुझे घूमना-फिरना अच्छा लगता है। बशर्ते कई लोग हों। मसलन अपना परिवार, रिश्तेदारों का परिवार या मित्र। जनवरी में चेन्नई-पुद्दुचेरी यात्रा की चर्चा अभी हमारे परिवार में चल ही रही थी कि तय हुआ इस बार गर्मियों में उत्तराखंड चला जाये। कार्यक्रम अपने मूल घर रानीखेत भी जाने का बना, लेकिन अचानक एक मौत की खबर आयी। रिश्ते में हमारी भाभी लगने वाली एक महिला का निधन हो गया। अंत समय में बेहद दुखद दिन देखने वाली यह महिला अपने जमाने में बेहद बिंदास थी। मैं उनके बच्चों की उम्र का हूं, रिश्ता हमारा देवर-भाभी वाला था। जैसी पारिवारिक और अन्य तकलीफों से वह गुजर रहीं थीं, उनका रुखसत होना ही परिणति थी। खैर... इस सूचना के बाद गांव जाने का कार्यक्रम तो मुल्तवी हो गया क्योंकि न तो पूजापाठ हो सकती थी और न ही घूमना-फिरना। बच्चे गर्मियों की छुट्टियां शुरू होते ही चले गये थे। हल्द्वानी, काठगोदाम। आसपास दीदीयां रहती हैं। ससुराल भी वहीं हैं। इस बीच अन्य रिश्तेदार भी पहुंचे। बड़ा बेटा मामा संग अल्मोड़ा के कई इलाकों में घूमने गया। पत्नी छोटे बेटे संग आसपास रिश्तेदारों के यहां मिलने में व्यस्त रही। तय कार्यक्रम के अनुसार मैं भी 22 जून को पहुंच गया। तय किया कि एक दिन 'सात ताल' चला जाये। दो दिन 'गर्जिया देवी', 'कोटाबाग', 'जिम कार्बेट', 'सीताबनी' इलाकों में गुजारे जायें। एक दिन आराम के बाद फिर वापस अपनी-अपनी जगह। इसी बीच हल्द्वानी में हमारे मित्र दिनेश, ललित दा की मांता जी के निधन की खबर मिली। स्वस्थ हालत में करीब 85 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ। उन्हें सब लोग ताईजी के नाम से पुकारते थे। वह मुझे बहुत प्यार करती थीं। कई बार उन्होंने अपनेपन से डांटा कि मिलने नहीं आता। और भी कई यादें उनसे जुड़ी हैं। उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने में भी रानीबाग स्थित श्मशान घाट गया। खैर होनी को कौन टाले। अब फिर विचार हुआ कि कहां चला जाये। बहुत सी जगहों पर चर्चा हुई। पहले हम लोग सात ताल गये। मैं आसपास तो खूब घूमा हूं, लेकिन प्रॉपर सात ताल पहली बार गया। वहां बहुत अच्छा लगा। बीच ताल में नाव में बैठकर आड़ू खाने का अलग ही लुत्फ आया। अगले दिन हम लोगों ने निकलना था दो दिन के टूर पर। पहले कोटाबाग अपने साढू भाई को रिसॉर्ट बुक कराने को कहा, लेकिन कोई खाली नहीं था, फिर अपने भांजे मनोज के सुसर श्री कांडपाल जी से अनुरोध किया। उन्होंने पहले ही वाक्य में कहा, सब हो जायेगा। आप लोग बस आ जाओ। इस बार हम लोग फिर दो गाड़ियों में थे। मेरी दीदी-जीजा जी, बच्चों के मामा-मामी बाद में एक साढूभाई की माताजी भी साथ हो लीं। उनके भी कुछ रिश्तेदार। इस बार के सफर में बच्चों की बड़ी मामी उनकी बेटी और बेटा साथ नहीं चले। हम लोग सुबह गर्जिया देवी गये। वहां पूजा-अर्चना के बाद नदी में बच्चों ने काफी देर तक एंजॉय किया। उसके बाद कांडपाल जी को फोन लगाया। उन्होंने कहा रिसॉर्ट तो सब फुल चल रहे हैं, पर इंतजाम पूरा है। आप लोग आ जाओ। जायें कि नहीं, इस असमंजस में हम लोग चल दिये। बीच में गाड़ी वाले ने कुछ चालाकी दिखायी और पैसे लेकर चलता बना। हमने भी उससे चिकचिक करनी पसंद नहीं की। कुछ लोग कांडपाल जी के यहां रुक गये, कुछ चले गये कोटाबाग। भांजे मनोज का आग्रह और कांडपाल जी की प्यारी जिद ने मुझे भी वहीं रोक लिया। अगले दिन सुबह पास में ही छोटे से डैम में मैं, मेरा बेटा और जीजाजी नहाने चले गये। एक घंटा नदी में ही पड़े रहे। बेहद आनंद आया। उसके बाद गये रमणीक स्थल सीताबनी में। यहां जाने का रास्ता था जिम कार्बेट जंगल के बीच पथरीली राहों भरा। बच्चों के मामा भास्कर की गाड़ी में मैं बैठा था। दिल्ली में कार चलाने वाले भास्कर ने इतनी खूबसूरती से वहां गाड़ी ड्राइव की, मैं हतप्रभ रह गया। सीताबनी पहुंचे। ठंडे झरनों में स्नान किया। फिर पूजापाठ। उसके बाद वहीं चाय बनायी। वहीं खाना बनाया और खाया। जंगल से सूखी लकड़ियां लेकर खाना बनाने और साथ खाने का जो आनंद आया, वह अवर्णनीय है। इस सबमें अन्य लोगों के अलावा मेरे साढूभाई सुरेश पांडेय जी का सहयोग बेहद सराहनीय रहा। शाम को हम लोग कोटाबाग होते हुए काठगोदाम आ गये। यहां आकर फिर पता चला एक बच्चे (हम तो बच्चा ही कहते हैं हालांकि वह करीब 25 साल का हो गया है) ने अपनी मां पर हाथ उठाया है। असल में वह उत्तराखंड में फैले स्मैकियों के जाल में कुछ साल पहले फंस चुका है। उसको सुधारने के तमाम प्रयास बेकार साबित हुए। उसे नशा मुक्ति केंद्र में भी डाला गया। प्यार से समझाया भी गया। वह इतना ‘चालाक’ है कि हम जैसे दो दिन के मेहमानों के समझाने पर ऐसे रिएक्ट करता है, मानो वह सुधर गया, लेकिन ऐसा होता नहीं। उस वक्त थोड़ा गुस्सा किया। अगले दिन उसे कुछ समझाया। उसके चाचा तो अगले दिन अपने काम पर लौट गये, लेकिन मुझे दो दिन और रुकना था। उसे मैंने भी बहुत समझाया। वह बोला, अब पढ़ाई करूंगा, कंपटीशन दूंगा। यहां बता दूं कि वह दसवीं तक पढ़ने में बहुत अच्छा था। जब तक हम रुके वह सामान्य बना रहा, लेकिन फिर खबरें नकारात्मक आ रही हैं। पता नहीं क्या होगा उसका। लेकिन इस बीच हैरान करने वाली बात हुई। पुलिस के कुछ अधिकारियों से मैंने बात की। उनका कहना था कि स्मैकियों के नेटवर्क को तोड़ना बहुत मुश्किल है। पंजाब आदि जगहों की तो लोग चर्चा करते हैं, लेकिन उत्तराखंड में नशे का भयानक जाल फैला है। इस पर कोई चर्चा नहीं करता। मैंने एसएसपी आदि को अलग से मेल भी किया है। जगह-जगह स्मैक बिक रहा है। कई बच्चे इसकी गिरफ्त में आ चुके हैं। हाल ही में वहां एक नशामुक्ति केंद्र तक में ये नशे के सौदागर पहुंच गये। खैर... उत्तराखंड का पूरा टूर अच्छा रहा, लेकिन इस बच्चे की वजह से सारा गड्डमड्ड हो गया। पता नहीं यह सुधरेगा भी या नहीं।

Sunday, June 18, 2017

हिमाचल के बद्दी की छोटी सी यात्रा



सफर के दौरान ही दिखा ईंट भट्टा

रासते में हरियाली ही हरियाली

सफर के बीच में पड़ा पंजाब का कुछ हिस्सा
पिछले दिनों अपने मित्र सुनील कपूर के साथ बद्दी जाने का कार्यक्रम अचानक बन गया। यूं इस यात्रा में उल्लेख करने लायक कुछ नहीं है, लेकिन चंडीगढ़ से बद्दी तक की सड़कें लाजवाब रहीं। गाड़ी फर्राटा भरती रही। रास्तेभर फल बेचने वालों की कतार लगी रही। यहीं से कुछ आम और आड़ू लिए। इस सीजन के पहले आम। रास्ते में ईंट के भट्ठे देखे। लखनऊ में जब रहता था तो ईंट भट्ठों के पास अक्सर जाया करते थे। घर से आलू और शकरकंदी ले गये। भट्ठे की गरम राख में दबा दिया। कुछ देर खेलकूद में मस्त फिर शकरकंदी और आलू निकालकर खाना। अब तो कहीं-कहीं ही भट्ठे दिखते हैं। लखनऊ में हमारे घर के आसपास जहां ये ईंट भट्ठे थे, वहां अब उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद की हाउसिंग स्कीम लॉन्च हो गयी है। बड़ी-बड़ी बस्तियां बस गयीं हैं। जहां खेत-खलिहान होते थे, वहां साइकिल से भी निकलना मुश्किल होता है। इसे विकास का असमान विस्तार कहा जाये या फिर कुछ फिलहाल बद्दी के मार्ग पर तो सड़कें भी चकाचक हैं और पेड़-पौधों के अलावा ईंट-भट्ठे भी दिखते हैं। रास्ते में कुछ देर सुस्ताने का मन हो तो उसके लिए भी कहीं-कहीं जगह दिख जाती है। वैसे विस्तार से घूमने का कार्यक्रम बनाऊंगा तो संभवत: और आनंद आयेगा। एक टोल भी पड़ा। कोई पर्ची नहीं, बस उसने 40 रुपये मांगे और जाने के लिए कह दिया।
-केवल तिवारी